चिदंबरम मामले में क़ानून के जानकारों के 5 सवाल
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की उस विशेष याचिका पर सुनवाई होनी थी जिसमें उन्होंने हिरासत में लिए जाने से पहले दिल्ली हाईकोर्ट के उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी ठुकराए जाने के फ़ैसले चुनौती दी थी.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस दिन इसकी सुनवाई के लिए शुक्रवार का दिन मुकर्रर किया और उसी शाम को चिदंबरम हिरासत में ले लिए गए, फिर सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें पांच दिन की पुलिस रिमांड में भेज दिया.
दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज किए जाने, सुप्रीम कोर्ट में उनकी अर्ज़ी पर तुरंत सुनवाई न होने और नाटकीय ढंग से उन्हें हिरासत में लिए जाने के इस पूरे घटनाक्रम पर क़ानूनविदों की राय बंटी हुई है.
सुप्रीम कोर्ट में चिदंबरम के आवेदन को लिस्ट नहीं किए जाने पर भी जानकारों की राय बंटी हुई है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने चिदंबरम की अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द करते हुए अपने आदेश में कहा, "... तत्काल मामले के तथ्यों से प्रथम दृष्टया प्रकट होता है कि याचिकाकर्ता किंग पिन यानी इस मामले के मुख्य साज़िशकर्ता हैं. क़ानूनी अड़चनें लगाकर क़ानून का शासन स्थापित करने वाली एजेंसियों को प्रभावहीन नहीं बनाया जा सकता है..."
वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन की फ़ेसबुक पोस्ट हाई कोर्ट में उस दिन ज़मानत याचिका को देर से अस्वीकार करने पर सवाल उठाती है.
इस पोस्ट में उन्होंने लिखा, "मुझे चिदंबरम के मामले में मेरिट्स और डिमेरिट्स की कोई जानकारी नहीं है. लेकिन सवाल है कि किसी जज को इसकी योग्यता को देखते हुए अग्रिम ज़मानत याचिका पर अपना आदेश रिटायरमेंट से दो दिन पहले तक सुरक्षित रखना चाहिए था? अगर जमानत याचिका को अंत में ख़ारिज ही करना था तो आखिर एक साल तक उन्हें गिरफ़्तारी से बचने का लाभ क्यों दिया गया? अगर उनका अपराध बहुत अधिक गंभीर था, जैसा कि अंतिम फ़ैसले से मालूम पड़ता है, तो सुनवाई ख़त्म होने के तुरंत बाद ही आदेश क्यों नहीं दिया गया."
गिरफ़्तारी के ख़तरे को देखते हुए अग्रिम ज़मानत याचिका को तत्काल लिस्ट ना करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्या है?
रेबेका जॉन अपने पोस्ट में लिखती हैं, "मेरा यह सुझाव नहीं है कि सभी मामलों में राहत दी जानी चाहिए, लेकिन लोगों के पास सुने जाने का अधिकार ज़रूर है? कभी तत्काल? कभी तुरंत? और क्या अदालत को इस तथ्य का भी संज्ञान नहीं है कि जिन लोगों की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी गई उन्हें वर्षों तक जेल में रहना पड़ा."
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस दिन इसकी सुनवाई के लिए शुक्रवार का दिन मुकर्रर किया और उसी शाम को चिदंबरम हिरासत में ले लिए गए, फिर सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें पांच दिन की पुलिस रिमांड में भेज दिया.
दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका ख़ारिज किए जाने, सुप्रीम कोर्ट में उनकी अर्ज़ी पर तुरंत सुनवाई न होने और नाटकीय ढंग से उन्हें हिरासत में लिए जाने के इस पूरे घटनाक्रम पर क़ानूनविदों की राय बंटी हुई है.
सुप्रीम कोर्ट में चिदंबरम के आवेदन को लिस्ट नहीं किए जाने पर भी जानकारों की राय बंटी हुई है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने चिदंबरम की अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द करते हुए अपने आदेश में कहा, "... तत्काल मामले के तथ्यों से प्रथम दृष्टया प्रकट होता है कि याचिकाकर्ता किंग पिन यानी इस मामले के मुख्य साज़िशकर्ता हैं. क़ानूनी अड़चनें लगाकर क़ानून का शासन स्थापित करने वाली एजेंसियों को प्रभावहीन नहीं बनाया जा सकता है..."
वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन की फ़ेसबुक पोस्ट हाई कोर्ट में उस दिन ज़मानत याचिका को देर से अस्वीकार करने पर सवाल उठाती है.
इस पोस्ट में उन्होंने लिखा, "मुझे चिदंबरम के मामले में मेरिट्स और डिमेरिट्स की कोई जानकारी नहीं है. लेकिन सवाल है कि किसी जज को इसकी योग्यता को देखते हुए अग्रिम ज़मानत याचिका पर अपना आदेश रिटायरमेंट से दो दिन पहले तक सुरक्षित रखना चाहिए था? अगर जमानत याचिका को अंत में ख़ारिज ही करना था तो आखिर एक साल तक उन्हें गिरफ़्तारी से बचने का लाभ क्यों दिया गया? अगर उनका अपराध बहुत अधिक गंभीर था, जैसा कि अंतिम फ़ैसले से मालूम पड़ता है, तो सुनवाई ख़त्म होने के तुरंत बाद ही आदेश क्यों नहीं दिया गया."
गिरफ़्तारी के ख़तरे को देखते हुए अग्रिम ज़मानत याचिका को तत्काल लिस्ट ना करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्या है?
रेबेका जॉन अपने पोस्ट में लिखती हैं, "मेरा यह सुझाव नहीं है कि सभी मामलों में राहत दी जानी चाहिए, लेकिन लोगों के पास सुने जाने का अधिकार ज़रूर है? कभी तत्काल? कभी तुरंत? और क्या अदालत को इस तथ्य का भी संज्ञान नहीं है कि जिन लोगों की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी गई उन्हें वर्षों तक जेल में रहना पड़ा."
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